zero movie

zero movie review. शाहरुख खान के किरदार की तरह बौनी साबित हुई जीरो

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आनन्द एल. राय की फ़िल्म ज़ीरो से दर्शकों को जीतने उम्मीदें थी उन्हें पूरा करने में नाकाम साबित हुई ज़ीरो। एक साल बाद दर्शकों के सामने आए शाहरुख खान की यह फ़िल्म चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाने के बाद भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। यह सही है कि एक बौने के किरदार को बड़े पर्दे पर प्रस्तुत करना कोई आसान काम नहीं होता । इस फ़िल्म में शाहरुख खान को देखकर कमल हासन की अप्पू राजा की याद सहज ही दिमाग में आ जाती है लेकिन अफसोस कि उस समय तकनीक की कमी के कारण हज़ार मुश्किलों के बाद भी अप्पू राजा दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रही थी। इससे पहले आनन्द एल. राय रांझणा और तनु वेड्स मनु जैसी सुपरहिट फिल्में ला चुके हैं जो आज भी दर्शकों को गुदगुदाने पर मजबूर कर देती हैं लेकिन इस फ़िल्म को बनाने में उनसे कहीं ना कहीं भारी चूक हो गई।

फ़िल्म का पहला हिस्सा जहां दर्शकों को बांधे रखता है वहीं अगला हिस्सा इतना उबाऊ हो जाता है कि दर्शक घड़ी में गुजरते समय को देखते हुए फ़िल्म के खत्म भर हो जाने का इंतज़ार करते नज़र आते हैं। सुपरस्टारों की बेमतलब की भीड़ भी  दर्शकों पर कोई खास छाप नहीं छोड़ पाई। अनुष्का शर्मा की बात करें तो उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत शाहरुख के साथ रब ने बना दी जोड़ी से की थी। इस फ़िल्म में भी दोनो की कैमस्ट्री लाज़वाब रही। कैटरीना की बात करें तो उन्होंने इस फ़िल्म में सुपरस्टार बबिता का रोल निभाया है जिसे बउआ सिंह बने शाहरुख खान अपनी ड्रीमगर्ल मानते हैं। फ़िल्म की कहानी मेरठ शहर की गलियों के जिंदादिल बउआ सिंह और उसके दोस्त गुड्डू अर्थात जीशान आयूब की खट्टी मिट्ठी शरारतों से शुरू होती है।  बउआ सिंह का कद केवल 4 फिट का होने के कारण 38 वर्ष के उम्र में भी उसे शादी के लिए लड़की नहीं मिलती। इस तलाश में वह एक मैरिज ब्यूरो चलाने वाले पांडे जी के पास पहुँच  जाता है और वहां आफिया यानी अनुष्का की तस्वीर को देखकर उससे शादी करने का मन बनाता है।

पांडेय उसे यह सच नहीं बता पाता कि आफिया सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी से पीड़ित है और चलफिर नहीं पाती। आफिया नासा की वैज्ञानिक है। आफिया से बउआ सिंह हैरान रह जाता है और इस तरह उनकी प्रेमकहानी शुरू हो जाती है। अचानक फ़िल्म में नया मोड़ आता है और शाहरुख को पता चलता है कि मेरठ में सुपरस्टार बबिता आई हैं तो वह शादी की रस्में बीच में ही छोड़कर उससे मिलने चला जाता है फिर उसके पीछे मुम्बई। जहां उसे सितारों की भीड़ दिखती है। बबिता उसे एहसास दिलाती है कि उस ने आफ़िया के साथ सही नहीं किया तो बउआ सिंह उसे मनाने अमेरिका यहां तक कि मंगल ग्रह पर भी पहुंच जाता है। यहीं आकर फ़िल्म की कहानी कहीं खो सी जाती है और निर्देशक के हाथों से छूटती हुई सी लगती है।

अगर सितारों की भीड़ में कुछ देखने लायक है तो वो वो है श्रीदेवी की एक झलक। फ़िल्म के क्लासिमेक्स को जबरदस्ती आगे घसीटा गया है। एक कम पढ़े लिखे बौने कद के  नौजवान का मंगल तक आफिया का पीछा करना,एक ही रात में अपने पिता के 6 लाख रुपए अपनी गर्लफ्रेंड पर लुटाना, सुपरस्टार बबिता का बउआ सिंह को देखकर इमोशनल हो जाना दर्शकों के गले से नहीं उतरता। कुल मिलाकर हम इस फ़िल्म को 5 में से 3 स्टार देंगे।